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Showing posts from 2020

पूरा जग उमड़ा था तेरी तमाशाई में

झुंझलाते क्यों हो बालू की चिकनाई में , उतर कर देख लो फिर थोड़ी गहराई में , मुझमें तेरे सिवा और कुछ बाकी कहां , तोहमतें भी चाहिए रुस्वाई में ।। तेरे तोहफ़ो को भी देखने के मोहताज नहीं हम , कई अब्द हुए अपनी बज़्म - आराई में ।। बिस्तर की सिलवटों को देख लग रहा, रात गुज़री है वाकई बड़ी तन्हाई में ।। उस भीड़ में हम दिखते भी कहां ,  पूरा जग उमड़ा था तेरी तमाशाई में ।। गर तुम जाना ही चाहती हो फिर चली जाओ , कुछ नहीं रखा बात की सच्चाई में ।।
कुछ अच्छा नहीं लग रहा तेरे बिना , तेरे सिवा कुछ अच्छा भी तो नहीं । कौन रौशन करे अंधेरी दुनिया मेरी , तेरे सिवा कुछ उजला भी तो नहीं । अश्क बह रहे हैं उनको बहने दो , इन चश्म में ख़्वाब तिरा भी तो नहीं । लौट कर आना चाहती हो मत आओ , मेरे घर आने का कोई रस्ता भी तो नहीं । आंखें रात भर रोती रही गुमनाम , इन आंखों में कुछ बचा भी तो नहीं ।।

ज़नाज़ा खानदानी चाहिए

मेरी जां कुछ वफ़ाई तुम्हें भी निभानी चाहिए , मेरे सिवा और भी क्या जिंदगानी चाहिए , इन निगाह से निकल कर आओ इनके सामने , आंखें दरिया बन गई और कितना पानी चाहिए । एक बोसा ही बहुत था तेरे उन रुखसार पर , और इश्क़ में तुम्हें क्या निशानी चाहिए । तुम चली हो गई दुनिया सरी बंजर हुई , फ़िर भी कहती हो जमीं पर गुल-फिशानी चाहिए । पस-अज़-मुर्दन आकर तुर्बत पे मेरी रोना नहीं , कह रहा 'गुमानम' ज़नाज़ा खानदानी चाहिए ।। गुल-फिशानी - sprinkling flower पस-अज़-मुर्दन - after death तुर्बत - कब्र 

रावण ने रावण को जलाया क्यों है

हर तरफ़ धुंध ही धुंध छाया क्यों है ? लोगों ने बत्तियों को बुझाया क्यों है ? आज भीड़ ने खुद को इक शक्ल में रखा है , हर शख़्स यहां पर ख़ुदा-या क्यों है? बुराईयों को पुतले में पेश कर रहे है वो , ऐब है तो फ़िर इतना सजाया क्यों है ? आंखों पर बंधी पट्टी हटा कर देखो , रावण ने रावण को जलाया क्यों है ? जब भरोसा है कि वो निर्णय लेगा एक दिन , फ़िर आज हमने ईश्वर को आज़माया क्यों है ? तुम अपनी नज़रें क्यों झुका रहे ' गुमनाम ' , जब जानते नहीं उन्होंने ठहाका लगाया क्यों है ?

कब तक जिंदा रखेगी ये बेहोशी मुझको

नज़रों से कितना घायल करेगी वो नक़ाबपोशी मुझको , मंज़िल भटका देते है ये बला-नोशी मुझको , उन आंखों ने कुछ तो जलवा बिखेरा है , ज़िंदा रखे है उनकी मदहोशी मुझको । भिखारी के शक्ल में लुटेरे आ गए है फ़िर , और कितना लुटाएगी ये फ़रामोशी मुझको ।। बेबाकी से कभी तअल्लुक रहा नहीं मेरा , मार डालेगी एक दिन ये ख़ामोशी मुझको । ज़मीर मारकर सांसे तो बचा लेंगे मगर , कब तक जिंदा रखेगी ये बेहोशी मुझको ।

इश्क़ ज़ख्मी भी है और ज़ख़्म भी ।

तेरा कहर भी देखा मैंने और रहम भी , इश्क़ भी तेरा और ये सितम भी , तुझे ख़्वाब से जाने की इजाज़त क्या दे , तू भी साथ है मेरे और ये वहम भी । कौन किसके ज़ख़्म पर पट्टी बांधता फिरे , इश्क़ ज़ख्मी भी है और ज़ख़्म भी । तेरी निगाहों से गिर कर जाएंगे और कहां , मेरी शुरुवात भी तुम्हीं और ख़त्म भी । शब-ए-हिज़्र में ख़्वाब से भी बिछड़ने का वायदा रहा , झूठा था दिलासा तेरा और झूठी कसम भी ।

कितनों के तुम और पसंदीदा हो गए

तुम्हें सूरत-ए-हाल देख शोरीदा हो गए , रौनक-ए-महफ़िल में भी संजीदा हो गए , *शोरीदा - परेशान        *संजीदा - गंभीर रात भर तुमने किसी की याद में गुज़ार दी , सुबह सुबह ही तुम जो ख़्वाब-बीदा हो गए । * ख़्वाब बीदा - नींद में  तेरी ज़ुल्फ से जितना बच सकते थे बचे , मगर होंठ के तिल पर गिरवीदा हो गए । * गिरवीदा - मुग्ध  किसकी आमादगी थी उस वस्ल की रात में , कितनों के तुम और पसंदीदा हो गए । * आमादगी - रज़ामंदी      * वस्ल - मिलन देखा था उसके चश्म में नज़र अपनी उतारते , इक सवाल पर ही लर्जीदा हो गए । * चश्म - आंख     * लर्जीदा - कांप जाना उनका भी शुक्रियादा कर दो ' गुमनाम ' , जिनकी बेवफ़ाई से तराशीदा हो गए ।। * तराशीदा - तराशा हुआ 

ये सब्र इश्क़ का

ये सब्र इश्क़ का ख़ानुमाँ-ख़राब बन गया ,  तेरा चुप रहना ही जवाब बन गया , वो हारता रहा कई सदियों तक मगर , इक दिन वो भी ज़फर - याब बन गया । तुम्हारा वायदा कुछ दिनों तक वायदा रहा , वो भी ना जाने कब एक ख़्वाब बन गया । डूब ख्वाहिशों के सफ़ीने सारे गए , इन अश्कों में जो आज सैलाब बन गया । तुमने तो कभी रूठ कर शिकवा ना किया , ये ज़ख्म - ए - दिल कैसे ख़ूनाब बन गया । शम्स को अपने होने का था बहुत गुरूर , इन बादलों ने घेरा तो माहताब बन गया । हुज़ूर ने क्रूरता की फूंक क्या मारी , वो चिंगारी से इंकलाब बन गया । * ख़ानुमाँ - ख़राब - भग्यहीन/बेघर * ज़फ़र-याब - विजयी * ख़ूनाब - खून के आंसू * शम्स - सूरज * माहताब - चांद

ये भूल जाने की कैसी खुमारी है

तेरे ख़्वाब का आना अब भी जारी है , ये भूल जाने की कैसी खुमारी है , तेरी तस्वीर जो रखी थी जला कर आ गए , उसकी राख से हमने नज़र उतारी है ।। तुझे भूलने का कल से सौदा करके आ गए , मगर आज मिलने की बेकरारी है ।। इन हिज़्र के दिनों उनके हाल जान लो , तेरी ज़ुल्फ में जिसने कई शामें गुज़ारी है ।। उस बोसा के अलावा सब वाहियात था , मगर जंग भी हमने वहीं पे हारी है ।।

पूरी शाम बाकी है

कितनी उम्र गुज़ार ली मगर तमाम बाकी है , इतनी जल्दी ना जाओ बहुत काम बाकी है । कब थमेगा ये सफ़र कोई जानता नहीं , अभी तो केवल दिन गुज़रा है पूरी शाम बाकी है । सब चरणों में शीश नवाए बैठे है सरकार के , और हुज़ूर कह रहे की अभी सलाम बाकी है । ख्वार - ए - हुस्न उतरा नहीं जो आंखों से चढ़ा गई , ये होंठ अब भी कह रहे की जाम बाकी है । ताश , सिगरेट और शराब सब आज महफ़िल में है , और कहो महफ़िल में क्या इंतजाम बाकी है । बहुत दूर तल्ख़ जाना है अभी तो ये शुरूआत है , अभी से कह रहे ' गुमनाम '  कयाम बाकी है । 

इक बोसा

शांत दिन लगभग सब स्थिर बस वक़्त ही दौड़ रहा था । हर पल ऐसा ही प्रतीत हो रहा था की कब समय आए और एक जगह से प्रस्थान करे ताकी दूसरी जगह आगमन हो सके । नगर तो नहीं कहेंगे मगर नगर से कुछ कम भी नहीं था जहां पर नगर के सारे सुख परंतु उनका उपभोग ना किया जा सके । उसी समय एक ऐसा कृत्य कर बैठे जिसका कर्ता तो मैं था मगर उसका समर्थन कभी भी वैचारिक और व्यावहारिक तौर पर नहीं करता था। तात्कालिक सामाजिक माहौल से प्रभावित होकर ( जो ट्रेंड में था ) जो शायद आज भी बदला नहीं है वो अमर्यादित कार्य जो मेरे नजरिए में है वो कर बैठे । हर किसी को इतनी बड़ी बात नहीं लगती मगर बात बड़ी ही थी । सुनी सुनाई बात यही थी प्रेयसी अपने प्रेमी के समक्ष कभी घबराती नहीं है परन्तु मेरे साथ तो सब उलट था । समाज में भूतपूर्व आशिकों के द्वारा बनाई धारणा के अनुसार मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था मेरे साथ तो कुछ  है ही नहीं । एक लड़की बमुश्किल पसंद आई वो भी सामने कुछ जाहिर ना करे , समझ ही ना आए किस बात को लेकर मन में धारणा बनाए की उसे भी हमसे इश्क़ है । सबने तो यही कहा था की लड़कियां पहल नहीं करती पहले झुकना तो लड़कों को ही पड़ता है । ले...

मन की भड़ास

मानो सब कुछ थम सा गया हो । दिल की हर एक धड़कन में , धमनियों में रक्त प्रवाह का पता चल रहा था । दिमाग भी कितना बेईमान होता है मन को स्थिर करने की बजाय मन जिधर ले जा रहा उसी के पीछे हो लिया । चिंताओं के बादल चारों तरफ इस कदर चढ़ गए जैसे प्रलय के आने का अंदेशा हो और हुआ भी आखिर वही । माथे से पसीने की धारा इस तरह बह रही थी जैसे रुके हुए नदी के जल प्रवाह को निकलने की जगह मिल गई हो । पंखा अपने प्रचंड रूप में चल कर भी अंदर की प्रचंड गर्मी को शांत करने में कामयाबी हासिल नहीं कर पा रहा था । मोहब्ब्त की सारी आकांक्षाएं धरी की धरी प्रतीत जान पड़ती । एक आखरी स्पर्श को तरसते हाथों की उंगलियों से पूछो की अपनों को छोड़ कर जाने पर आखिरी स्पर्श ज़िन्दगी की बैटरी में कितनी ऊर्जा भरने का काम करता है । हां कुछ शर्मिंदगी ज़रूर होती है समाज को दिखाने में क्योंकि आप के निजी सम्बन्ध कभी समाज स्वीकार नहीं करता । अब वो चाहे समाज की अपरिपक्वता को दर्शाता हो या फिर हमारे भीतर बैठे संकोच और एक सामान्य सा डर की लोग क्या कहेंगे । लेकिन आज की पीढ़ी इस डर को पीछे छोड़ ज़िन्दगी के हर लम्हे अपनी स्वछंदता से जीने लगी है ...

तिरी याद मिटाए जा रहा हूं मैं

ख़्वाबों को तस्लीम कर हटाए जा रहा हूं मैं , तुझपर कितना वक़्त लुटाए जा रहा हूं मैं , तुम कह रही की खाली बैठा रहता हूं , तसव्वुर से तिरी याद मिटाए जा रहा हूं मैं । मेरे अश्क़ बुझा देंगे जलन मेरी ; सोचा था , कम्बख़त आग और भड़काए जा रहा हूं मैं । क्यों ना करूं नफ़रत उसकी निगाहों से , मुद्दतों से जिनकी यादों का सताए जा रहा हूं मैं । उस तिल के उभार पर किसी और का बोसा सह जाना , देख तेरी बेवफ़ाई सरेआम बताए जा रहा हूं मैं ।

ज़मीं भी उसको आहटों से जानने लगी

ज़मीं भी उसको आहटों से जानने लगी , ये कब्र मेरी धड़कने पहचानने लगी , बेवफ़ाई की तोहमतें लगा रही थी ना , फ़िर क्यों आजकल ख़ाक छानने लगी । इतने साल बात करने की इनायत ना हुई , ये कैसा इश्क़ तुम हमसे निभाने लगी । इतने दिनों बाद नींद दस्तक दे रही है , फ़िर तिरी याद मुझको आने लगी । तुम्हारी वफ़ा पर और भरोसा क्या करे , मुझसे ज्यादा गैरों की बात जब मानने लगी ।

मंज़िल तक साथ अब निभाना नहीं है क्या

अपने चाहने वालों को दिखाना नहीं है क्या ? अब किसी और से दिल लगाना नहीं है क्या ? इन आंखों में क्यों इतना मशगूल हो गई , आज फ़िर पलकों को झुकाना नहीं है क्या ? तेरे चेहरे से पहली दफ़ा घूंघट उठाया है , होठों पर तबस्सुम रख शर्माना नहीं है क्या ? गुज़ार तो लें ज़िन्दगी बस तुम्हें देखकर , तुम्हारे अलावा और ज़माना नहीं है क्या ? आधे राह से ही लौटने का मन बना लिया , साथ मंज़िल तक अब निभाना नहीं है क्या ? इस मसाफ़त का कोई इलाज़ ढूंढ़ लो , पास आने का कोई बहाना नहीं है क्या ? कितने दिन हिज़्र की रातें गुजारेंगे , तुमको मिलने अब यहां आना नहीं है क्या ?

।। मगर दिल अबतक भूला नहीं है ।।

हमें जीने की और तमन्ना नहीं है , तुम्हारे बिना और जीना नहीं है । बातें ना की एक लफ्ज़ भी उन्होंने , कैसे कहें वो खफा नहीं है ।। नज़रें मिला कर झुका ली उन्होंने , ये कैसा था इश्क़ जो हुआ नहीं है ।। ज़रा सा निगाहें उठा कर तो देखो , कि मंज़र अभी कुछ बदला नहीं है ।। वो शख़्स ही बताए मनाए उसको कैसे , जो शख्स अब तक मना नहीं है ।। तुम्हें भूलने का दावा करें है , मगर दिल अबतक भूला नहीं है ।।

रूलाए जा रहा मुझे

तुम्हें ख़्वाब में देखने की ज़िद सुलाए जा रहा मुझे , तेरा बेवफ़ा हो जाना रुलाए जा रहा मुझे । दिन भी गुजर रहा खाली रातें भी गुजर रही , धीरे ये अकेलापन खाए जा रहा मुझे । एक गई फिर कई आएंगी इश्क़ का बाज़ार है ये , कई बरसों से यार मेरा समझाए जा रहा मुझे । एक तड़प तेरे जाने और एक मिल जाने की , तेरी याद में मेरा मन खुद भुलाए जा रहा मुझे ।

तेरी ख़ामोशी में गुफ्तगू का सिलसिला कैसा

तेरी ख़ामोशी में गुफ्तगू का सिलसिला कैसा , तेरा दीदार करने में आंखों का मसअला कैसा , तुम हो नहीं नाराज़ गर उस एक बोसा से , होठों पर तबस्सुम आंखों में फिर ज़लज़ला कैसा । तुमने बेवफ़ा कहकर उसे ठुकरा दिया था ना  , इतनी तोहमतों के बाद दिल में दाखिला कैसा । इश्क़ के सफ़र में जब तुम्हें अकेले चलना है , कहो ' गुमनाम ' इन गुमनामियों में काफ़िला कैसा ।

आ गई तुम मेरी रातें बिगाड़ने

क्या आ गया शेर खुले में दहाड़ने , लग गए गीदड़ गला फाड़ने , एक गाड़ी रास्ते में क्या पलट गई , लग गए अपराधी मानवता झाड़ने ।। एक पत्ती ने हिलने की खता क्या करी , लग गए लोग सारे पेड़ उखाड़ने । एक फ़ोन ने तेरे मेरा सब्र तोड़ दिया , आ गई तुम फ़िर मेरी रातें बिगाड़ने ।  वो भीगे बाल लेकर बाहर क्या गई , आ गया सारा मोहल्ला ताड़ने ।।

कई है किस्से फिर से उन पर लाद आया

 कई है किस्से फ़िर से उनपर लाद आया , तुम आई और मुरत्तब रूदाद आया , ख़ामोशी ओ दूरियों की जद में रिश्ते है , नज़रों के नज़रों का उफ्ताद आया । बरसों बाद जो देखा तुझको जी भर के , आहिस्ता वो इश्क़ पुराना याद आया । तेरी जुल्फों को छूकर क्या नज़रें गुज़री , दिल के फ़िर पिघलने का फरियाद आया । तुझपर पहला हक मेरा होना था , क्या खता की मैं ही सबसे बाद आया ।

तभी से तुम तसव्वुर में और ये आंखें नमनाकी है ।

ज़िंदा है वही जिसमें थोड़ी बेबाकी है , इश्क़ गर तुमसे कर बैठे इसमें कैसी चालाकी है ? जबसे रोते तुझको छोड़ गए तेरे आंगन से , तभी से तुम तसव्वुर में और ये आंखें नमनाकी है । गुज़र जाती है रातें अक्सर तेरे खयालों में , मेरी जानाँ कई रातों की मेरी नींद बाकी है । चलेंगी सांस कब तक और इन अंधेरे कमरों में ? ये कैसी ज़िन्दगी मौला मेरे तुमने अता की है ? सालों से तुझे इक पल देखने की गुज़ारिश है , कहो किसपर अदा तुमने अपनी फ़िदा की है ? फ़िज़ूल इश्क़ है अपना ओ गर फिजूल सारी बातें है , कलम तुम सिर मेरा करदो अगर मैंने खता की है ।

कैसे फिर बहार ए चमन आएगा ?

कर्म बुरे हो किए तो फिर बुरा ही ज़मन आएगा ? हवा का आइने में कैसे अक्स-फ़गन आएगा ? वज़ारत जब जुबानों पर जा टिकी हो , तो कैसे फिर माथे पर शिकन आएगा ? गुलज़ार दीवार - ओ - दर की ज़द में हो , कैसे फ़िर बहार - ए - चमन आएगा ? तुम्हारा होना पुरखों की गलतियों का नतीजा हो ,  कैसे फिर इन उंगलियों में फ़न आएगा ? दूर कहीं वो किसी और की ज़िन्दगी में है , कहो कैसे फ़िर इस ज़िन्दगी में सुख़न आएगा ?

आधे राह उतर जाना ज़रूरी है क्या ?

मेरी ख्वाहिशों का मर जाना जरूरी है क्या ?  तेरा शहर जाना जरूरी है क्या ? अपनी बेबसी को मार कर पूछो , इतने दिन ठहर जाना जरूरी है क्या ? मिलन के बाद का पहला त्योहार है ये , तुम्हारा घर जाना ज़रूरी है क्या ? आज तो पूरा चांद निकला है , साहिल - ए - बहर जाना ज़रूरी है क्या ? अब तो इश्क़ की कश्ती पर सवार हो लिए , आधे राह उतर जाना ज़रूरी है क्या ? तुम्हारे होठों की सिलवटों पर भी मर मिटेंगे , मगर ये उमर जाना ज़रूरी है क्या ?

मालिक रातों की ज़द में है

सब आवारा हुए ; खाली रैन - बसेरा क्यों है ? ईमानदार सब हो गए ; नेता लुटेरा क्यों है ? आसमां में जब सूरज उगा है , फ़िर सारे जहां में अंधेरा क्यों है ? जब मालिक रातों की जद में है , फ़िर नौकर के घर सवेरा क्यों है ? जिस पेड़ का एक तिनका भी ना बचा , उसपर फ़िर परिंदों का बसेरा क्यों है ? उनके हिस्से में हिज़्र की रातें नहीं है क्या ? इश्क़ में सारा ज़र्फ़ सिर्फ़ मेरा क्यों है ? तुमने तो कहा था कि क़त्ल करना छोड़ दिया है  , फ़िर चेहरे पर इन जुल्फों को बिखेरा क्यों है ? हर खुशी तुम्हारे साथ है जानाँ , फ़िर दूसरी तरफ़ तुमने मुंह फेरा क्यों है ?

भटकों को राह दिखाना पड़ता है ।

भटकों को राह दिखाना पड़ता है ,  इश्क़ भी क्या जताना पड़ता है ? किसकी नज़रें कितनी ज़्यादा क़ातिल है , ये बतलाने आंख मिलाना पड़ता है । हमने देखा तुमने देखा इश्क़ हुआ , इसमें किसका खून बहाना पड़ता है । आसां होते तो सारे रिश्ते टिक जाते , मेरी जानाँ साथ निभाना पड़ता है । कच्चे रिश्ते रहकर साथ तड़पाते है , भोजन भी खुद ही पकाना पड़ता है । यूं ही ख्वाहिश खत्म थोड़ी हो जाती है , इसके खातिर दिल जलाना पड़ता है । जितनी ज्यादा याद तेरी आ जाती है , उतना ही मलहम लगाना पड़ता है ।

बताए खुद ही वो शख्स इतना मुब्तला क्यों है ?

दिन आए है गर अच्छे तो फिर इतनी बला क्यों है , तेरे दीदार करने का , नहीं कोई मशगला क्यों है ? जो कहते थे बहुत खुशियां पड़ी है अपने आंगन में , बताए खुद ही वो शख्स इतना मुब्तला क्यों है ? ज़िंदा रहना और मरना यहां दोनों ज़रूरी है , कम्बख़त ये नाकाबिल ज़िन्दगी इतनी मरहला क्यों है ? उजाड़ी कोख हो जिसने मिटाएं हो कई सिंदूर , कहो "गुमनाम" तिरी सरकार में वो फूला - फला क्यों है ?

मुझे स्वीकार कर लो

ख़्वाब कितने है अधूरे तुम नहीं तो प्रीत गई , नाराज़गी अब तुम्हारी मुझसे फिर जीत गई , हो दुनिया में अकेले अब मुझे संसार कर लो , कब तक अकेले जलते रहेंगे अब मुझे स्वीकार कर लो । कह दिया तुमने मुझे बिन सोचे समझे बेवफ़ा , गुनाह हो मेरा कहो कुछ यूं ना हो मुझसे खफा । मेरे जिस्म मेरी ज़िन्दगी पर अब तुम्हीं अधिकार कर लो , कब तक अकेले जलते रहेंगे अब मुझे स्वीकार कर लो । हो गई जो मै सीता सी होगा ज्वलन असहनीय तुमसे , राम बन कर दिखाओ गर चाहते हो सीय हमसे , रिश्ते ज़हरीले नहीं है अब तो मुझसे प्यार कर लो , कब तक अकेले जलते रहेंगे अब मुझे स्वीकार कर लो ।  

कुछ तुझ सा ही

कुछ तुझ - सा ही तेरा ये शहर है , इसकी फिज़ाओं में भी ज़हर है , किसकी ज़िन्दगी रोशन करे खुदा , यहां खुद धुंध में महर है । क़यामत तो आना तय है , अभी बेजुबान बना ये पहर है । सूख जाती है नदियां भी नफरतों से यहां , पता नहीं कैसे जिंदा ये नहर है ।

मत छुपाओ तुम अपने गुनाहों को ।

मत छुपाओ तुम अपने गुनाहों को , ज़िंदा रहना है तो थमा दो पतवार जुलाहों को , दरिया ए इश्क़ पार करना आसान लगता है , डुबा बैठोगे साथ अपने निबाहों को । दिल उकता गया है हमसे तुम्हारा गर , जाओ , बना लो आशियाना किसी के बाहों को । इतना शर्माना बेवफ़ा का ठीक नहीं , मत झुकाओ अपनी निगाहों को । तैराकी काम नहीं आती तूफ़ानी लहरों में , तवायफ डुबा दी है कई बादशाहों को । हिमाकत ही ना की जब मंजिल पाने की , फ़िर क्या कोसना इन बेकसूर राहों को ।

अब्र को बेवक्त बरसात करना पड़ रहा है

अब्र को बेवक्त बरसात करना पड़ रहा है , काबिल को बद ज़ात करना पड़ रहा है , बेचने वाले का धर्म इजाज़त नहीं देता , मगर मुश्तरी को मफादात करना पड़ रहा है । कितनों ने पूरी ज़िन्दगी गुज़ार दी अंधेरे में मगर , वजीर ए आज़म के गुलज़ार में लअमात करना पड़ रहा है । लोगों को दान की हवस क्या लगी , लूट कर खैरात करना पड़ रहा है । कौन कहता है यहां पैसा का वजन नहीं , क्या; यूं ही गुनहगारों को निजात करना पड़ रहा है । वक़्त है जिसपर महरबां हो जाए , जानता हूं मजबूरन तुम्हें बात करना पड़ रहा है ।

सुना है तुम शहर से बाहर जा रही हो

सुना है तुम शहर से बाहर जा रही हो , किसको दिल से अपने बाहर किए जा रही हो , ऊब चुके है हम इस अकेलेपन से यहां , ये बताओ की मेरे पास कब तक आ रही हो । दुप्पटा चादर क्या क्या लपेटे रखी हो , चेहरा दिखाओ मुझसे क्यों शर्मा रही हो । शादी की तारीख किससे तय कर आईं , ये कैसा इश्क़ है जो तुम मुझसे निभा रही हो । खिड़कियों से नज़रें गैरों को तकने लगी है , कोई नया आशिक़ है जिससे दिल लगा रही हो ।

बेवफ़ा हो बेवफ़ा तुम

साथ थे अब इससे बढ़कर और शोहरत लो गी क्या ? बेवफ़ा हो बेवफ़ा तुम और गैरत लो गी क्या ? इश्क़ में क्या सोचना , क्या मैं तेरे काबिल नहीं , मां से बढ़कर इस जहां में बड़ा भी वो अफजल नहीं , बीते ज़िन्दगी के साल कितने और मोहलत लो गी क्या ? बेवफ़ा हो बेवफ़ा तुम और गैरत लो गी क्या ? टूट कर तुमको था चाहा तुमसे प्यार था किया , तुम पर ही सब था लुटाया तुमपर ऐतबार था किया , खुद की जां पर बन आई अब और रहमत लो गी क्या ? बेवफ़ा हो बेवफ़ा तुम और गैरत लो गी क्या ? दर पर सबकी हो भटकती किसने ठुकराया नहीं , मेरी चौखट ज्यों तुम लांघी फिर किसीने अपनाया नहीं , दूर सबसे हो गई हो अब तुम हिज़रत लो गी क्या ? बेवफ़ा हो बेवफ़ा तुम और गैरत लो गी क्या ? तोहमतें इतनी लगी फिर भी कोई शिकवा नहीं , उड़ा ले जाए जो हमको ऐसा कोई तूफां नहीं , मुझको भी तुमने अब बेचा और दौलत लो गी क्या ? बेवफ़ा हो बेवफ़ा तुम और गैरत लो गी क्या ?

हक़ीक़त थे जो सारे अब फ़साने हो गए ।

कभी तेरे थे अब किसी और के ठिकाने हो गए , कभी रहे प्याले आज मयखाने हो गए , मेरा तकना और तेरा मुस्कुरा जाना , हक़ीक़त थे जो सारे अब फ़साने हो गए । तेरे दिल पर राज करना गर सब झूठा था , क्या हो गया कि हम बेगाने हो गए । उस रात मुलाकात का सच बस इतना था , नज़र मिली और हम तेरे दीवाने हो गए ।  कितनी नज़रों से बचा कर रखा तुमको , जिनसे बचाया उनके हम निशाने हो गए । ख्वाबों में ही तुमसे मिलना हो पाता था , नींद को भी आए कई ज़माने हो गए ।

कैसा दिन है जो ढलने का नाम ना ले रहा ।।

कैसा दिन है जो ढलने का नाम ना ले रहा , मजदूर खाली बैठे है मगर कोई काम ना ले रहा । बेबसी देख मलहम लगाने सब आ पहुंचे , कई लूट रहे मगर है कोई जो दाम ना ले रहा । जुबां सूखी है और वो लबों पर माइक लगाए रखे है , सब पानी चाहते है कोई भी कलाम ना ले रहा । सरकार नहीं है , वो मेहनत कर खाता है , वो इक मजदूर है साहब किसी से हराम ना ले रहा । मदिरा हो या रिश्वत सब बेखौफ ले रहे , कोई दो निवाला भी सरेआम ना ले रहा ।  कितनों ने दूसरों के टुकडों पर गुज़ार दी ज़िन्दगी अपनी , इक मजदूर है जो अपने हिस्से का तआ'म ना ले रहा । क्या हारा हुआ ही समझे उसको ?  जो जीत कर भी अपना इनाम ना ले रहा । छालों साथ नंगे पैरों से रस्ते नाप डाले , थके है , टूटे है मगर कोई भी कयाम ना ले रहा ।

ख्वाबों में भी तुम्हे हम देखना छोड़ देंगे

ख्वाबों में भी तुम्हें हम देखना छोड़ देंगे , तुम कहो तो फिर हम जीना छोड़ देंगे , अभी दूर हूं तो देख सब उछल रहे है इतना , तेरे जब साथ होऊंगा तो सब पसीना छोड़ देंगे । भरोसा है तो उसके सामने हाथ सब फैला रहे है , टूट जाए गर तो जाना मंदिर मदीना छोड़ देंगे । मयखाना भी खाली होने को आ पहुंचा , याद ना आए तेरी तो फिर हम पीना छोड़ देंगे । चांद की चमक भी फीकी पड़ गई है तेरे सामने , तू मिल जाए गर तो हम दफीना छोड़ देंगे । मिल जाएगा गर मुझसे ज्यादा चाहने वाला , बता देना , तेरी नज़रों का हम तखमीना छोड़ देंगे ।

मिरि पीठ पर थूके हुए कई दाग अब भी है

कहने को है कि हर शख़्स इज़ाफ़त ही करता है , अपने कर्मों पर ! कौन है यहां जो आज खिफ्फत ही करता है । मिरि पीठ पर थूके हुए कई दाग अब भी है , दुनिया सामने होती है तो वो भी जियाफत ही करता है । सामने वो हां में बस हां ही मिलाता है , पीछे मुड़ते हर शख़्स ख़िलाफत ही करता है । उसके इश्क़ में हिज्र की कई रातें गुजारी है , अब भी वो मेरे इश्क़ की मुखालिफत ही करता है। है नाराज़गी मुझसे तो बढ़िया है और होने दो , मिलन की रात वो मिलता नहीं बस आफ़त ही करता है । ये जो लोगों ने इश्क़ के नाम की दुकानें खोल रखी है , हर शख़्स बस हवस मिटाने का हिर्फत ही करता है ।।

अब्सार तरसते है

यूं ही खाली क्यों बैठे है आओ कुछ कर गुजरते है , इश्क़ खत्म हुआ गर तो दुबारा फिर से करते है । सुना है कोई वबा आई है जो तुम इतना दूर रहती हो , जुदा होकर भी मरना है तो आओ फिर साथ मरते है । अभी तो होंगे भरे रखे वो पाउडर क्रीम के डिब्बे , हम आए तो वो खाली हो सब हमें देख संवरते है । जो तुमने इक बार तोड़ा दिल अब तल्ख़ सही से जुड़ ना पाया है , कोई अब छू भी देता है हजारों टुकडों में बिखरते है । कभी तो आंखों से ओझल ना होने का नाम लेती तुम  , इक तेरी झलक देखने को ये अब्सार तरसते है ।।

वो आशिक़ नहीं एक जुआरी है

जो हालत इधर है क्या वही तुम्हारी है , तुझपे क्या खर्च कर दे जब अब तल्ख़ बेरोज़गारी है , कोई और है ज़िन्दगी तेरी तो सब सफा कह दो मुझे , बेवफा दिखाना खुद को अच्छी अदाकारी है । तब्दीर करे तुम जो इश्क़ करती हो , ये सौदा है और कहती हो लाचारी है । देख कर नज़रें फेर लेना , तुम्हारे इश्क़ की अच्छी खातिरदारी है । तुम्हारी खिड़कियों पर नज़रें यूं गड़ाए रखना , तुम्हे देखने की कसक अभी भी जारी है । वो तुम्हारे जिस्म से खेलने का सौदा कर आया , वो आशिक़ नहीं एक जुआरी है । चोट करना हो तो डंडे की चोट कर लो मुझपर , इस ज़ुबां की चोट बहुत करारी है । आब - ए - तल्ख़ पीकर भी भुलाना चाहा तुमको , तुम हो इक और तुम्हारे यादों की खुमारी है ।।

बेवफा कह कर सबको दिखलाया नहीं जा रहा ।।

एक खयाल है तेरा भुलाया नहीं जा रहा , खाना भी हलक से अंदर नहीं जा रहा । आओ ज़िंदगी बसर करनी है संग तेरे , बिन तेरे अब जिया भी नहीं जा रहा ।  होंगे कई गिले शिकवे मुझसे फ़िर , तुझसे कुछ क्यों कहा नहीं जा रहा । तेरा जाना कुछ इस कदर असर कर गया मुझपर , इन अश्कों के काफिलों को रोके रोका नहीं जा रहा । तबीयत कुछ नासाज़ है वो तो होनी थी , तुझको जो कई रोजों से देखा नहीं जा रहा । तुम रूठी हो मानो ज़िन्दगी रूठी हो मेरी , खुश करने को झूठ उगलवाया नहीं जा रहा । क्या करे तेरी तस्वीर का जो मुद्दतों से छुपा रखे है , बेवफ़ा कह कर सबको दिखलाया नहीं जा रहा । तीलियां जलाई जाती है तस्वीर जलाने को तेरी , तुझको छुआ जिन हाथों ने उनसे जलाया नहीं जा रहा । जल जाती है उंगलियां उन्हीं तीलियों से मिरी , नाराज़गी इतनी तीलियों को बुझाया नहीं जा रहा ।

कुछ तो हुआ होगा ।।

मुझसे पहले किसी ने तेरे गालों को छुआ होगा , सच सच बताना कुछ तो हुआ होगा । इस जहां में सब रेगिस्तान तो नहीं , गला सूख रहा है कहीं तो कुंआ होगा ।। पैसा , ताश , सिगरेट सब पकड़ लोगे , ये दुनिया है यहां ज़िन्दगी का जुआ होगा ।। एक ख्वाहिश थी 'तुम' खत्म हो गई शायद , ये राख है अब कहां धुंआ होगा ? ।।
नज़रों ने जैसे ही उसके होंठों पर  निशाना साधा है , तुरंत ही उसने चेहरे पर रुमाल बांधा है । अभी तक तो पीटने की नौबत ना आई है , उसकी नज़रें देख कर कुछ मुस्कुराई है । त्योरियां तो उसकी अब भी चढ़ी हुई है , बगल वाले के फोन में ही गड़ी हुई है । अबकी बार मेसेज पढ़ कर चेहरा शरमाया है ,  मिस यू बाबू का मेसेज जो आया है । वो बोली ऐसा लगा बहार आया है , उसने पूछी जगह, शायद ऊंचाहार आया है । बस की फर्श को कचरों ने छुपाया है , मूंगफली के छिलके तक तो ठीक पर किसी ने मॉर्टिन गिराया है । सफ़र खत्म होने को था क्या नई फसल बोना है , उसने फोन खोल दिखया की उसका भी बाबू शोना है । लड़कियां पट जाएंगी , जरूरी नहीं नाईक का जैकेट होना चाहिए , बस माथे पर **या नहीं लिखा होना चाहिए ।।

ख़्वाब - सा था इश्क़

ख़्वाब - सा था इश्क़ मेरा हकीकत से वास्ता न था , उसके अलावा उसे बताने को कोई दास्तां न था , राह क्या देखती वो मेरे आने का , उसके दर पर जाने का जब रास्ता न था । ज़िन्दगी को उसकी सब गुलिस्तां बनाने की बात करते  थे , मिलने पहुंचे तो हाथ में किसी के एक गुलदस्ता न था । हम यहां उसी के हुस्न में जो डूबे रहते थे , एक उसका दिल था जो मिलने को तरसता न था । वे लोग उसपर सब कुछ लुटा रहे थे , कम्बख़त मुझ पर तो ये बादल भी बरसता न था । वो मेरे साथ रिश्ते तब रखना चाहती थी , अब जब उसके साथ कोई रिश्ता न था । और कहां से लाते तोड़ कर चांद तारे ' गुमनाम ' ? इंसान हूं मै भी कोई फरिश्ता न था ।।

चाहता हूं मैं उसकी आंखों में खो जाना ; खो जाने दो ।।

चाहता हूं मैं उसकी आंखों में खो जाना ; खो जाने दो, जुदाई में वो गर नहीं रोना चाहती ; तो फिर मुस्कुराने दो , था कभी और है आज भी उससे इश्क़ बेइंतहां , अगर वो गैर की होना चाहती है , रोको मत हो जाने दो । कई बरसों से वो उसकी बांहों में सोना चाहती थी , सुकून से सो रही है , उठाओ मत सो जाने दो । वो कली थी रोशनी पाकर खिल गई होगी , अब उसको वही मुरझाना है , मुरझाने दो । वो तवायफ़ नहीं जो तोहफ़े देते और दिल लगा लेते , अब उसे कोई तोहफ़े दिला रहा है , दिलाने दो । उसका मुकर जाना बेवफ़ा कहे या मज़बूरी , मेरा ना सही किसी का भी साथ निभा रही , निभाने दो ।

वो खत ।

वो खत रखे भी होंगे ?  या राख बन नालियों का रुख किए होंगे , देता तोहफ़े तो रखी खिताबों में खोंस देती , वो खत भी वहीं पर शायद रख दिए होंगे । हां जला देती अगर  वो महज टुकड़े कागज़ के होते , शब्दों के नहीं एहसासों के जलने पर ज्यादा हम ही रोते । शब्दों का नज़रों से गुजर जाना , अब्सार से शुरू होकर  लबों पर जाकर थम जाना । सारे एहतमाम पर  पानी फिर गया होगा , कोई बातों ही बातों में नज़रों से गिर गया होगा । लाइन होगी कहां ? खत तो चूल्हे में जलती लकड़ियों की  रोशनी में पढ़ रही होगी , अजीब गंध है ;  देखो सहेलियां छत पर  खड़ी होकर जल रही होंगी । नहीं , वो चूल्हे पर दाल रख  खत में मशगूल बैठी हूं , उलझे भाव को समझने में  सब कुछ भूल बैठी हूं । हां तिरी बेवफ़ाई ही कुछ  ज्यादा लिखी मैंने , कहना साफ बातें भी तुम्हीं से सीखी मैंने । नहीं , उन लोगों ने ही  ज्यादा कीचड़ उछाला है , शक जायज़ भी था  उन्हीं से तो निवाला है । हां अभी तो ठिकाने के लिए छत की  छाया भी चाहिए , मुहब्बत के मुकम्मल होने को सर्माया भी चाहिए । इश्क़ का भी पैसे से ही  यह...

इश्क था या जो भी तुमसे अब दुबारा न हो पाएगा ।।

खटकता हो जो आंखों में आंख का तारा न हो पाएगा , लगा लो जितनी ताकतें नकारा न हो पाएगा , तुम्हारे कोई ख़्वाब में है आंखे डूबी है हुई , ऐ इश्क़ इजहार कर दो इशारा न हो पाएगा । हौसला ही ना हो जब उठ कर चलने का तो फ़िर , लगा लो जितनी हो बैसाखियां सहारा न हो पाएगा । साथ होती तुम अगर हम भी होते अब्द तक , अब नहीं हो तुम तो फिर गुज़ारा न हो पाएगा । निकाल कर खंजर से चाहे दिल को रखो पास तुम , हो चुका है जो अब उनका तुम्हारा न हो पाएगा । लाख होती ऐब तुझमें सिर से चाहे पैर तक , इक तेरा बेवफ़ा हो जाना गवारा न हो पाएगा । कर रही हो शक तो फ़िर रिश्ता मुकम्मल है कहां ? इश्क़ था या जो भी तुमसे अब दुबारा न हो पाएगा ।

कैसा मकां तेरा और मेरा घरौंदा क्या ?

तुम्हीं तो हो नज़र में और इन आंखों में ज़िंदा क्या ? उड़ना भूल गर जाए तो परिंदा क्या ?  जो रहनुमा ना हो तुम्हारे पते का , तेरे शहर में वो ठहरा बाशिंदा क्या ?  मेरा ही चाहना गुनाह है तुझको , अपनी खूबसूरती पर इतना शर्मिंदा क्या ? लग गए जिस्म से गर खेलने तुम भी , फ़िर क्या तू और वो दरिंदा क्या ? दीवारें तपने लग जाए लू के तपन से फ़िर , कैसा मकां तेरा और मेरा घरौंदा क्या ?

कहे थे दूर रहो सब जलती है ।।

बातें नहीं करती मुझसे  मुझको भुला दिया क्या ? इक कोने में अकेली बैठी हो किसी ने फिर रुला दिया क्या ? कहे थे दूर रहो उनसे  सब जलती है , किसी की खातिर उन्होंने तुम्हें फ़िर बहला दिया क्या ? दीवार की दरारों में रखी  जो तस्वीर मेरी थी , मिल नहीं रही गायब है जला दिया क्या ? लबों से जाम जो  पिलाकर आए थे , नशे में अब तक हो  किसी और ने पीला दिया क्या ?

इश्क़ है बेवफाई थोड़ी है ।।

चिंगारी लगी थी ; तुझमें लगाई थोड़ी है , त'अल्लुक़ तोड़ी हो यादों की रिहाई थोड़ी है , जी नहीं भरता दीदार - ए - हुस्न से तेरे , इश्क़ है बेवफ़ाई थोड़ी है । तुझमें तेरी मुस्कुराहटों में इलाज़ ढूंढता रहा , बाज़ार में हर इल्लत की दवाई थोड़ी है । अश्कों के काफिले बहाने लगती हो , मुलाकात है जुदाई थोड़ी है । जह्मत ना उठाओ ; बोलो यूं ही चले जाएंगे ज़िन्दगी से तेरी , मुसाफ़िर है घर जमाई थोड़ी है ।

दर्द है , शायद वो सहने लगी है अब

दर्द है , शायद वो सहने लगी है अब , कुछ खफा - खफा - सी मुझसे वो रहने लगी है अब ,   ख़ामोश होकर मुर्दा - सी पड़ी रहती थी , ज़ुबां भी कुछ कहने लगी है अब । कह दो हवा से की वो थम जाए , चिंगारी फ़िर भड़कने लगी है अब । गुज़ारे थे कुछ पल साथ उसके , ख्वाबों में भटकने लगी है अब । तस्वीरों को आंखों में कैद करके रखा था , बूंदे बनकर मिटने लगी है अब ।  दिल के किवाड़ खटखटाए थे कभी , आंखों में खटकने लगी है अब । मुझसे दूर रहो सब कहते थे उसे , साथ होने में झिझकने लगी है अब । मुझसे मिलने का समय नहीं उसको , किसी और से इश्क़ करने लगी है अब । समय गुजर रहा इंतजार में उसके , पलकें भी झपकने लगी है अब।  ज़ुल्म सहते - सहते इन मौसमों का , छते भी टपकने लगी है अब ।