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जो इश्क़ अगर हो दूजा फ़िर ....

दिल फिर से बेचारा हो जाए , आंखों का तारा हो जाए , जो इश्क़ अगर हो दूजा फ़िर  तुमसे ही दुबारा हो जाए , टूटे तारे से ख्वाहिश है ,  फ़िर अम्बर का सितारा हो जाए ..

कहिया मिलन होई मोर सजनिया ...

बीतल न जाए दिनवा , बीते न रतिया , कहिया मिलन होई मोर सजनिया ,  दिनवा न गीनल जाए बहे आंखे पनिया,  कहिया मिलन होई मोर सजनिया ,  मंगिया में तोरा कहिया , सिंदूर(सेनूर) भराई , तोर पिरितिया में , रतिया सताई , कहिया सुनाई तोर पायल की छनिया, कहिया मिलन होई मोर सजनिया .... जऊन दिन अंचरा से तोहरे बंधाईब , वचन तोहरा से हम , सातों निभाइब, गले में मंगलसूत्र , होई अगिया के फेरिया, कहिया मिलन होई मोर सजनिया... तीन गो नीलकुरिंजी बीतल उमरिया, टूटे लागल अब गर्दिश के तरिया, देखी पतझड़ कितना निमवा के छंहिया, कहिया मिलन होई मोर सजनिया ....

तेरे गाल के एक बोसा ने मुझको पागल कर डाला ....

इश्क़ में जानां थे अधूरे आज मुकम्मल कर डाला , तेरे गाल के एक बोसा ने मुझको पागल कर डाला .... आंखे उसकी गर्दिश और हम उसके इक तारे थे , आंखों का तारा कहकर उसने आंखों से ओझल कर डाला... दिल से निकाला बड़े प्यार से पलकों पर बैठाया था , फिर अपने खाली दिल को उसने और भी चंचल कर डाला ... झूठ ही कहते कुछ न होगा तेरे रुखसत होने से , तेरी याद में आंखो को सावन का बादल कर डाला ... बेवफा की तोहमत देकर उसने दिल से बेघर कर डाला , खुद को मैंने दुश्मन की आंखों का काजल कर डाला... कहती थी मेरे जाने के सदमे तुम कैसे झेलोगे , दिल को यारों इन सदमों से रोज़ मुसलसल कर डाला ....

उनके रोने से अच्छी है शिकस्तगी अपनी ।

गैर हो गई ज़िंदगी अपनी , जब समुंदर से बड़ी तिश्नगी अपनी , रुसवा है , तंग है , ये राहें भी , छोड़ आए अब दिल्लगी अपनी ।  दर्द जिंदगी के अधूरे होने का नहीं, ये जो नामुकम्मल रही आवारगी अपनी । वो हंसे बस मामलात इतना भर था , उनके रोने से अच्छी है शिकस्तगी अपनी । मुफलिसी में अपनों की हिदायत से ,  लाख अच्छी है बेगानगी अपनी । उनकी एक बेफाई से ही रो रहे गुमनाम , कैसी नामर्दानी है मर्दानगी अपनी ।।

हम तमाम उम्र देख कर भी गुनहगार हो गए ।।

इज्ज़त थी इसीलिए तार तार हो गए , एक पल में ही वो आपके शहरयार हो गए , वो एक नज़र देखे क्या खूब देखे , हम तमाम उम्र देख कर भी गुनहगार हो गए ।। वो आए पल भर में आशियां उजड़ा , हमारे ख्वाब सारे उनके साया-दार हो गए ।। मोहब्बत भी करो तो कई तरीके से , 'गुमनाम' एक सी करके बेज़ार हो गए ।।

बेवफाई को इतना बेकरार क्यों हो ?

इश्क़ में हमारे कर्ज़दार क्यों हो ? बेवफाई को इतना बेकरार क्यों हो ? मेरे जाने से बोझ हल्का हो गया , मगर अब भी तुम गम-ख्वार क्यों हो ? अश्क, आंखों की चौखट तक आकर पूछते है , अब भी तुम मेरे शहरयार क्यों हो ? नदी उस पार कर दूं तो रुखसत हो जाओगी, दानिस्ता पूछती हो बीच मझधार क्यों हो ? इश्क़ किसी से हो , वफ़ा का चर्चा हो , आजकल विज्ञापन से अख़बार क्यों हो ?

गिरते गिरते पलकों से तेरी

दर्द , तूने जो दिए दिल में रहने लगे है , आखों के आंसू गम कहने लगे है ।। साहिल पे दिन ढलते चलती फिजाएं , ज़ुल्फो से तेरी होकर बहने लगे है ।। मुस्काती हो सुन कर उनकी ज़ुबाने ख्वाहिश दिल के बदलने लगे है ।। बांधे जो तूने झूठे पुलिंदे, पहली ही बारिश में ढहने लगे है ।। उनकी ही बातें दिन ओ रातें , दिल में जो तेरे अब रहने लगे है ।। गिरते गिरते पलकों से तेरी , ‘गुमनाम’अब गिरकर संभलने लगे है ।।