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कैसा मकां तेरा और मेरा घरौंदा क्या ?

तुम्हीं तो हो नज़र में और इन आंखों में ज़िंदा क्या ? उड़ना भूल गर जाए तो परिंदा क्या ?  जो रहनुमा ना हो तुम्हारे पते का , तेरे शहर में वो ठहरा बाशिंदा क्या ?  मेरा ही चाहना गुनाह है तुझको , अपनी खूबसूरती पर इतना शर्मिंदा क्या ? लग गए जिस्म से गर खेलने तुम भी , फ़िर क्या तू और वो दरिंदा क्या ? दीवारें तपने लग जाए लू के तपन से फ़िर , कैसा मकां तेरा और मेरा घरौंदा क्या ?

कहे थे दूर रहो सब जलती है ।।

बातें नहीं करती मुझसे  मुझको भुला दिया क्या ? इक कोने में अकेली बैठी हो किसी ने फिर रुला दिया क्या ? कहे थे दूर रहो उनसे  सब जलती है , किसी की खातिर उन्होंने तुम्हें फ़िर बहला दिया क्या ? दीवार की दरारों में रखी  जो तस्वीर मेरी थी , मिल नहीं रही गायब है जला दिया क्या ? लबों से जाम जो  पिलाकर आए थे , नशे में अब तक हो  किसी और ने पीला दिया क्या ?

इश्क़ है बेवफाई थोड़ी है ।।

चिंगारी लगी थी ; तुझमें लगाई थोड़ी है , त'अल्लुक़ तोड़ी हो यादों की रिहाई थोड़ी है , जी नहीं भरता दीदार - ए - हुस्न से तेरे , इश्क़ है बेवफ़ाई थोड़ी है । तुझमें तेरी मुस्कुराहटों में इलाज़ ढूंढता रहा , बाज़ार में हर इल्लत की दवाई थोड़ी है । अश्कों के काफिले बहाने लगती हो , मुलाकात है जुदाई थोड़ी है । जह्मत ना उठाओ ; बोलो यूं ही चले जाएंगे ज़िन्दगी से तेरी , मुसाफ़िर है घर जमाई थोड़ी है ।

दर्द है , शायद वो सहने लगी है अब

दर्द है , शायद वो सहने लगी है अब , कुछ खफा - खफा - सी मुझसे वो रहने लगी है अब ,   ख़ामोश होकर मुर्दा - सी पड़ी रहती थी , ज़ुबां भी कुछ कहने लगी है अब । कह दो हवा से की वो थम जाए , चिंगारी फ़िर भड़कने लगी है अब । गुज़ारे थे कुछ पल साथ उसके , ख्वाबों में भटकने लगी है अब । तस्वीरों को आंखों में कैद करके रखा था , बूंदे बनकर मिटने लगी है अब ।  दिल के किवाड़ खटखटाए थे कभी , आंखों में खटकने लगी है अब । मुझसे दूर रहो सब कहते थे उसे , साथ होने में झिझकने लगी है अब । मुझसे मिलने का समय नहीं उसको , किसी और से इश्क़ करने लगी है अब । समय गुजर रहा इंतजार में उसके , पलकें भी झपकने लगी है अब।  ज़ुल्म सहते - सहते इन मौसमों का , छते भी टपकने लगी है अब ।