ये भूल जाने की कैसी खुमारी है

तेरे ख़्वाब का आना अब भी जारी है ,
ये भूल जाने की कैसी खुमारी है ,

तेरी तस्वीर जो रखी थी जला कर आ गए ,
उसकी राख से हमने नज़र उतारी है ।।

तुझे भूलने का कल से सौदा करके आ गए ,
मगर आज मिलने की बेकरारी है ।।

इन हिज़्र के दिनों उनके हाल जान लो ,
तेरी ज़ुल्फ में जिसने कई शामें गुज़ारी है ।।

उस बोसा के अलावा सब वाहियात था ,
मगर जंग भी हमने वहीं पे हारी है ।।

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