कैसा दिन है जो ढलने का नाम ना ले रहा ।।
कैसा दिन है जो ढलने का नाम ना ले रहा ,
मजदूर खाली बैठे है मगर कोई काम ना ले रहा ।
बेबसी देख मलहम लगाने सब आ पहुंचे ,
कई लूट रहे मगर है कोई जो दाम ना ले रहा ।
जुबां सूखी है और वो लबों पर माइक लगाए रखे है ,
सब पानी चाहते है कोई भी कलाम ना ले रहा ।
सरकार नहीं है , वो मेहनत कर खाता है ,
वो इक मजदूर है साहब किसी से हराम ना ले रहा ।
मदिरा हो या रिश्वत सब बेखौफ ले रहे ,
कोई दो निवाला भी सरेआम ना ले रहा ।
कितनों ने दूसरों के टुकडों पर गुज़ार दी ज़िन्दगी अपनी ,
इक मजदूर है जो अपने हिस्से का तआ'म ना ले रहा ।
क्या हारा हुआ ही समझे उसको ?
जो जीत कर भी अपना इनाम ना ले रहा ।
छालों साथ नंगे पैरों से रस्ते नाप डाले ,
थके है , टूटे है मगर कोई भी कयाम ना ले रहा ।
Comments
Post a Comment