अब्र को बेवक्त बरसात करना पड़ रहा है

अब्र को बेवक्त बरसात करना पड़ रहा है ,
काबिल को बद ज़ात करना पड़ रहा है ,

बेचने वाले का धर्म इजाज़त नहीं देता ,
मगर मुश्तरी को मफादात करना पड़ रहा है ।

कितनों ने पूरी ज़िन्दगी गुज़ार दी अंधेरे में मगर ,
वजीर ए आज़म के गुलज़ार में लअमात करना पड़ रहा है ।

लोगों को दान की हवस क्या लगी ,
लूट कर खैरात करना पड़ रहा है ।

कौन कहता है यहां पैसा का वजन नहीं ,
क्या;
यूं ही गुनहगारों को निजात करना पड़ रहा है ।

वक़्त है जिसपर महरबां हो जाए ,
जानता हूं मजबूरन तुम्हें बात करना पड़ रहा है ।


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