कुछ तुझ सा ही

कुछ तुझ - सा ही तेरा ये शहर है ,
इसकी फिज़ाओं में भी ज़हर है ,

किसकी ज़िन्दगी रोशन करे खुदा ,
यहां खुद धुंध में महर है ।

क़यामत तो आना तय है ,
अभी बेजुबान बना ये पहर है ।

सूख जाती है नदियां भी नफरतों से यहां ,
पता नहीं कैसे जिंदा ये नहर है ।


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