मिरि पीठ पर थूके हुए कई दाग अब भी है

कहने को है कि हर शख़्स इज़ाफ़त ही करता है ,
अपने कर्मों पर ! कौन है यहां जो आज खिफ्फत ही करता है ।

मिरि पीठ पर थूके हुए कई दाग अब भी है ,
दुनिया सामने होती है तो वो भी जियाफत ही करता है ।

सामने वो हां में बस हां ही मिलाता है ,
पीछे मुड़ते हर शख़्स ख़िलाफत ही करता है ।

उसके इश्क़ में हिज्र की कई रातें गुजारी है ,
अब भी वो मेरे इश्क़ की मुखालिफत ही करता है।

है नाराज़गी मुझसे तो बढ़िया है और होने दो ,
मिलन की रात वो मिलता नहीं बस आफ़त ही करता है ।

ये जो लोगों ने इश्क़ के नाम की दुकानें खोल रखी है ,
हर शख़्स बस हवस मिटाने का हिर्फत ही करता है ।।

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