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Showing posts from June, 2020

मुझे स्वीकार कर लो

ख़्वाब कितने है अधूरे तुम नहीं तो प्रीत गई , नाराज़गी अब तुम्हारी मुझसे फिर जीत गई , हो दुनिया में अकेले अब मुझे संसार कर लो , कब तक अकेले जलते रहेंगे अब मुझे स्वीकार कर लो । कह दिया तुमने मुझे बिन सोचे समझे बेवफ़ा , गुनाह हो मेरा कहो कुछ यूं ना हो मुझसे खफा । मेरे जिस्म मेरी ज़िन्दगी पर अब तुम्हीं अधिकार कर लो , कब तक अकेले जलते रहेंगे अब मुझे स्वीकार कर लो । हो गई जो मै सीता सी होगा ज्वलन असहनीय तुमसे , राम बन कर दिखाओ गर चाहते हो सीय हमसे , रिश्ते ज़हरीले नहीं है अब तो मुझसे प्यार कर लो , कब तक अकेले जलते रहेंगे अब मुझे स्वीकार कर लो ।  

कुछ तुझ सा ही

कुछ तुझ - सा ही तेरा ये शहर है , इसकी फिज़ाओं में भी ज़हर है , किसकी ज़िन्दगी रोशन करे खुदा , यहां खुद धुंध में महर है । क़यामत तो आना तय है , अभी बेजुबान बना ये पहर है । सूख जाती है नदियां भी नफरतों से यहां , पता नहीं कैसे जिंदा ये नहर है ।

मत छुपाओ तुम अपने गुनाहों को ।

मत छुपाओ तुम अपने गुनाहों को , ज़िंदा रहना है तो थमा दो पतवार जुलाहों को , दरिया ए इश्क़ पार करना आसान लगता है , डुबा बैठोगे साथ अपने निबाहों को । दिल उकता गया है हमसे तुम्हारा गर , जाओ , बना लो आशियाना किसी के बाहों को । इतना शर्माना बेवफ़ा का ठीक नहीं , मत झुकाओ अपनी निगाहों को । तैराकी काम नहीं आती तूफ़ानी लहरों में , तवायफ डुबा दी है कई बादशाहों को । हिमाकत ही ना की जब मंजिल पाने की , फ़िर क्या कोसना इन बेकसूर राहों को ।

अब्र को बेवक्त बरसात करना पड़ रहा है

अब्र को बेवक्त बरसात करना पड़ रहा है , काबिल को बद ज़ात करना पड़ रहा है , बेचने वाले का धर्म इजाज़त नहीं देता , मगर मुश्तरी को मफादात करना पड़ रहा है । कितनों ने पूरी ज़िन्दगी गुज़ार दी अंधेरे में मगर , वजीर ए आज़म के गुलज़ार में लअमात करना पड़ रहा है । लोगों को दान की हवस क्या लगी , लूट कर खैरात करना पड़ रहा है । कौन कहता है यहां पैसा का वजन नहीं , क्या; यूं ही गुनहगारों को निजात करना पड़ रहा है । वक़्त है जिसपर महरबां हो जाए , जानता हूं मजबूरन तुम्हें बात करना पड़ रहा है ।

सुना है तुम शहर से बाहर जा रही हो

सुना है तुम शहर से बाहर जा रही हो , किसको दिल से अपने बाहर किए जा रही हो , ऊब चुके है हम इस अकेलेपन से यहां , ये बताओ की मेरे पास कब तक आ रही हो । दुप्पटा चादर क्या क्या लपेटे रखी हो , चेहरा दिखाओ मुझसे क्यों शर्मा रही हो । शादी की तारीख किससे तय कर आईं , ये कैसा इश्क़ है जो तुम मुझसे निभा रही हो । खिड़कियों से नज़रें गैरों को तकने लगी है , कोई नया आशिक़ है जिससे दिल लगा रही हो ।

बेवफ़ा हो बेवफ़ा तुम

साथ थे अब इससे बढ़कर और शोहरत लो गी क्या ? बेवफ़ा हो बेवफ़ा तुम और गैरत लो गी क्या ? इश्क़ में क्या सोचना , क्या मैं तेरे काबिल नहीं , मां से बढ़कर इस जहां में बड़ा भी वो अफजल नहीं , बीते ज़िन्दगी के साल कितने और मोहलत लो गी क्या ? बेवफ़ा हो बेवफ़ा तुम और गैरत लो गी क्या ? टूट कर तुमको था चाहा तुमसे प्यार था किया , तुम पर ही सब था लुटाया तुमपर ऐतबार था किया , खुद की जां पर बन आई अब और रहमत लो गी क्या ? बेवफ़ा हो बेवफ़ा तुम और गैरत लो गी क्या ? दर पर सबकी हो भटकती किसने ठुकराया नहीं , मेरी चौखट ज्यों तुम लांघी फिर किसीने अपनाया नहीं , दूर सबसे हो गई हो अब तुम हिज़रत लो गी क्या ? बेवफ़ा हो बेवफ़ा तुम और गैरत लो गी क्या ? तोहमतें इतनी लगी फिर भी कोई शिकवा नहीं , उड़ा ले जाए जो हमको ऐसा कोई तूफां नहीं , मुझको भी तुमने अब बेचा और दौलत लो गी क्या ? बेवफ़ा हो बेवफ़ा तुम और गैरत लो गी क्या ?