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मेरी खूबसूरती फ़िर कितनी ख़ूबसूरत होगी

जाने किसके आंखों की शरारत होगी , होगी किसी के बाहों में तो सलामत होगी , ये निगाहें जो तुम औरों से मिला बैठी हो , ये बात जीने के लिए कितनी गैरत होगी ।। अख़बारों में खबरों की खाक छानती हो , मौत की खबर मेरी , बशीरत होगी ।। मेरी बदसूरती से तुम इश्क़ जो कर बैठी हो , मेरी खूबसूरती फ़िर कितनी ख़ूबसूरत होगी ।। वस्ल की रात और ये ख़ामोशी , बेवफ़ाई में न जाने कब ज़मानत होगी ।। बड़ी ख़ामोशी से बाहर बैठे हो ‘गुमनाम’, होगी तो आज की रात बहुत कयामत होगी ।।

सत्तर सालों से केवल वो सत्ता सत्ता खेल रहे ।।

लोगों खातिर लोकतंत्र सब अंधा हो गया , इस पूंजीवाद में हवा का भी धंधा हो गया ।  अपने ही लोग मर रहे मगर चुनाव जिंदा है , नेता जब हुए जनावर अब कोरट भी शर्मिंदा है ।। दुर्दशा का हाल देख लो मध्य क्षेत्र की झांकी है , धीरे धीरे मेरी जानां सारा देश बाकी है ।। बेड स्ट्रेचर नेता खा गए लोग भी सांसे खो रहे , उठा लाओ वो सारे बिस्तर जिसपर नेता सो रहे ।। माना चुनाव सब जीत गए पर मानवता तो हारी है , बिछ गई लोगों की लाशें मगर ये उत्सव जारी है ।। लोकतंत्र के नाक के नीचे राजशाही का दंश झेल रहे , सत्तर सालों से केवल वो सत्ता सत्ता खेल रहे ।। हाहाकार मचा हुआ है शहरों और अखबारों में , मौज काट रहे सारे नेता सत्ता के गलियारों में ।। खाने को क्या पड़े है लाले जो लाशों से कमाएंगे , श्मशान नहीं है खाली फिर संसद में लोग दफनाएंगे ।। समाजसेवियों पर केस हुआ अब सेवा भी शर्मसार है ,  ऐसे राज्य के सिस्टम पर लानत और धिक्कार है ।।

पलकों से उतार न देना किसी मोड़ पर

 पतझड़ है ये भी गुज़र जाएगा , फूलों पर लौट कर भंवर आएगा , पेड़ तो सदियों से पतझड़ देख रहे , डालियों के सजने का अब पहर आएगा । पलकों से इसी बात की कशमकश हो रही , हल्की रही तो इनपर से कोई गिर जाएगा । पलकें बिछाने की ख्वाहिश भी है , कोई बैठेगा इनमें तो ठहर जाएगा । जिस तरह आंखें भर कर देखती हो तुम , कोई उतरेगा इनमें तो डूबकर ही मर जाएगा । होंठों पर लालियां भी आर्टिफिशियल लग गई , जाने कितनो का चहरा इनसे संवर जाएगा । एक तीर अपनी आंखों से छोड़ भी देना , जिसको लगेगी वहीं पर बिखर जाएगा । पलकों से उतार न देना किसी मोड़ पर , कोई बैठेगा खुद ‘गुमनाम’ फ़िर उतर जाएगा ।।

बजट 2022-23

शुरुवात में कोरोना काल में हुई प्रभावित पढ़ाई की चिंता कर 200 चैनलों की शुरुवात की है । शिक्षा मंत्रालय अब तक क्या कर रहा था । उसे ये नहीं पता था कि पढ़ाई प्रभावित हो थी है या सारा काम वित्त मंत्रालय का ही है । सरकार उस वक्त भी महत्वपूर्ण कदम उठा सकती थी जबकि दो साल बीत जाने पे कदम उठाए जा रहे क्योंकि अभी तक ये सरकार यह मानने को ही तैयार नहीं थी की किसी की नौकरी गई है और उनके बच्चे असमर्थ है विद्यालय जाने में । शिक्षकों के घर में ही उनके लिए डिजिटल बोर्ड या अन्य व्यवस्था की जा सकती थी जिससे वे लाइव पढ़ा पाए । दूसरी बात जल संरक्षण की अभी नमामि गंगे कार्यक्रम का ही कुछ नहीं बताया गया की वो कितना सफल हुआ कितना असफल । हज़ारों करोड़ों सा आंकड़ा हमेशा बताया जाता है उसका उपयोग कहां हुआ कुछ पता नहीं ना ही उसका ब्यौरा दिया गया । जब विजन ही 5 साल का था तो ब्यौरा एक साल में कोई मांगेगा भी नहीं । ये मैनेजमेंट वालों ने चालाकियां कर गर्त कर दिया । कह रहे है पांच नदियों को जोड़ेंगे ये नहीं पता की जिस गांव के बगल से नदी जा रही वहां के लोग नदी से सिंचाई नहीं कर रहे उसकी व्यवस्था कीजिए लोग भूजल की जगह अ...

सूना सूना सारा बाज़ार लगता है ।।

ये दिल कितना बेकरार लगता है , किसी की नजरों का शिकार लगता है , हिज़्र की रात और ये ख़ामोशी , कितना अजीब ये इंतज़ार लगता है ।। आंखें उसकी जिस तरह से तकती उसको , दोनों का प्यार बेशुमार लगता है ।। कमीज़ की जेबें जब खाली हो पड़ी , सूना सूना सारा बाज़ार लगता है ।। किसी तालाब में डूबने का जी कर रहा , बहुत भारी अब जिंदगी का भार लगता है ।। लहरों में लिपट जब मन हार जाए , किनारा भी तब बीच मजधार लगता है ।।

तब 'गुमनाम' देखो किधर जाएंगे ??

आसमान बिजलियों से सज जाएंगे , बादल और तेज़ गरज जाएंगे , बत्तियां जलाने की अजमाइश में , लोग अपनी किस्मत से उलझ जाएंगे ।। आसमानों ने भी अंधेरा कर लिया , धीरे धीरे चश्म खुद बुझ जाएंगे ।। एक रात इश्क में बात न करो , जाने लोग क्या क्या समझ जाएंगे ।। टूटकर तो फिर बिखर ही जाना है , एक रहे रिश्ते  सुलझ जाएंगे ।। इश्क़ का दौर और ये ठंडी हवा , हिज़्र आएगी तो बरस जाएंगे ।। जब ताल्लुकात की आखिरी डोर टूट जाएगी , तब 'गुमनाम' देखो किधर जाएंगे ??

शाम होते घोंसलों को चहकना भी है ।।

तेरी उंगलियों से होकर के बहना भी है , तुझको देखने को थोड़ा ठहरना भी है , इन घोसलों में दिन भर से ख़ामोशी है , शाम होते घोंसलों को चहकना भी है ।। फ़ूल ही समझ लगाओ तो अपने गुलशन में , बसंत आने पर मुझको फिर महकना भी है ।। तेरी ज़ुल्फ में ही एक शाम हो गई , अभी तो इन आंखों में उतरना भी है ।। इन सूनी हथेलियों में अब मेहंदी क्यों नहीं , मेरी खातिर तुमको अब संवरना भी है ।। रोज़ बेहतर जीने की कश्मकश भी है , रोज़ मंजिल तक पहुंच घर लौटना भी है ।। उसकी निगाहों से कब तक छुपते फिरोगे ‘गुमनाम’ हर रोज़ उसकी गली से गुज़रना भी है ।।