इश्क़ में जानां थे अधूरे आज मुकम्मल कर डाला , तेरे गाल के एक बोसा ने मुझको पागल कर डाला .... आंखे उसकी गर्दिश और हम उसके इक तारे थे , आंखों का तारा कहकर उसने आंखों से ओझल कर डाला... दिल से निकाला बड़े प्यार से पलकों पर बैठाया था , फिर अपने खाली दिल को उसने और भी चंचल कर डाला ... झूठ ही कहते कुछ न होगा तेरे रुखसत होने से , तेरी याद में आंखो को सावन का बादल कर डाला ... बेवफा की तोहमत देकर उसने दिल से बेघर कर डाला , खुद को मैंने दुश्मन की आंखों का काजल कर डाला... कहती थी मेरे जाने के सदमे तुम कैसे झेलोगे , दिल को यारों इन सदमों से रोज़ मुसलसल कर डाला ....
रूढ़िवादी रिवायत नहीं देखी जाती , मोहब्बत की झूठी रिसालत नहीं देखी जाती , कह रही थी उससे कोई ताल्लुक ही नहीं , उसके बाहों में तेरी शरारत नहीं देखी जाती ।। शरीफों की महफ़िल और लबों पर बोसा, हाय! ऐसी शराफत नहीं देखी जाती ।। तेरी ज़ुल्फ के छांव में उसका बैठ जाना , मुझसे तेरी इजाज़त नहीं देखी जाती ।। नाकामी आते ही तेरा चला जाना , मोहब्बत में सियासत नहीं देखी जाती ।। न रखिए मोहब्बत के ताल्लुक हमसे , वफ़ा से बगावत नहीं देखी जाती ।। झूठों के तहों से जो एक झूठ लाई हो , उफ्फ़ ! ये वकालत नहीं देखी जाती ।।
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