इश्क़ में जानां थे अधूरे आज मुकम्मल कर डाला , तेरे गाल के एक बोसा ने मुझको पागल कर डाला .... आंखे उसकी गर्दिश और हम उसके इक तारे थे , आंखों का तारा कहकर उसने आंखों से ओझल कर डाला... दिल से निकाला बड़े प्यार से पलकों पर बैठाया था , फिर अपने खाली दिल को उसने और भी चंचल कर डाला ... झूठ ही कहते कुछ न होगा तेरे रुखसत होने से , तेरी याद में आंखो को सावन का बादल कर डाला ... बेवफा की तोहमत देकर उसने दिल से बेघर कर डाला , खुद को मैंने दुश्मन की आंखों का काजल कर डाला... कहती थी मेरे जाने के सदमे तुम कैसे झेलोगे , दिल को यारों इन सदमों से रोज़ मुसलसल कर डाला ....
वो खत रखे भी होंगे ? या राख बन नालियों का रुख किए होंगे , देता तोहफ़े तो रखी खिताबों में खोंस देती , वो खत भी वहीं पर शायद रख दिए होंगे । हां जला देती अगर वो महज टुकड़े कागज़ के होते , शब्दों के नहीं एहसासों के जलने पर ज्यादा हम ही रोते । शब्दों का नज़रों से गुजर जाना , अब्सार से शुरू होकर लबों पर जाकर थम जाना । सारे एहतमाम पर पानी फिर गया होगा , कोई बातों ही बातों में नज़रों से गिर गया होगा । लाइन होगी कहां ? खत तो चूल्हे में जलती लकड़ियों की रोशनी में पढ़ रही होगी , अजीब गंध है ; देखो सहेलियां छत पर खड़ी होकर जल रही होंगी । नहीं , वो चूल्हे पर दाल रख खत में मशगूल बैठी हूं , उलझे भाव को समझने में सब कुछ भूल बैठी हूं । हां तिरी बेवफ़ाई ही कुछ ज्यादा लिखी मैंने , कहना साफ बातें भी तुम्हीं से सीखी मैंने । नहीं , उन लोगों ने ही ज्यादा कीचड़ उछाला है , शक जायज़ भी था उन्हीं से तो निवाला है । हां अभी तो ठिकाने के लिए छत की छाया भी चाहिए , मुहब्बत के मुकम्मल होने को सर्माया भी चाहिए । इश्क़ का भी पैसे से ही यह...
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