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मोहब्बत मसाफत में जो मनहूफ़ हो गई

एक अदालत और यहां मौक़ूफ़ हो गई , एक कहानी और यहां मक़हूफ़ हो गई , * मौक़ूफ़ - निरस्त या स्थगित   * मक़हूफ़ - सर धड़ से अलग  दिल मानने को तैयार ही नहीं , तुम किसी की जिंदगी में मसरूफ़ हो गई ।। बेवफाई जिस ज़िंदगी में है , वो ज़िंदगी इश्क पर ग़ुज़रूफ़ हो गई ।। *  ग़ुज़रूफ़ - लानत तेरा चला जाना क्या सितम ढहा दिया , ये काया मोम की मा'जूफ़ हो गई ।। * मा'जूफ़ - पुतला कोई तो तेरे करीब आया है , मोहब्बत मसाफत में जो मनहूफ़ हो गई ।। * मनहूफ़ - कमज़ोर

क्या तरक्की हुई है तेरी निज़ामी में ।।

नौकर है फिर भी कमी नहीं सलामी में , हम हारे भी तो बड़ी धूम-धामी में , वो बोलने की हिदायत सिखा रहे , जिन्हे गर्व है अपनी बद-कलामी में ।। हाल क्या सुनाए उस जिंदगी का जो तुमसे मयस्सर है , काट रहे है हर पल बस तेरी गुलामी में ।। अपनी कुर्सी का इंतेजामात कर तो आए हो मगर , लोग मर रहे तुम्हारी बद-इंतजामी में ।। निवाले छीन साहिल पर जो रिहाइशियां  बना रहे हो तुम , बह जाएंगे सब बस एक सुनामी में ।। उस जहान में मशहूर हम  हो तो गए होंगे , सदियां जो हमने काटी थी गुमनामी में ।। बारिशों में भी घर जल गए है  लोगों के , क्या तरक्की हुई है तेरी निज़ामी में ।। सहेज कर तुम क़फ़स में खुश रखना  चाहते हो , खिल उठेंगे ख़ुद ही बे-नियामी में ।। तुम्हें छोड़ कर भी मंज़िल हम पा लेंगे , अकेले क्या करेंगे ऐसी मकामी में ।।

क्यों इतना तुमसे ताल्लुकात रख रहे है हम ।

तन्हाई भरी जिंदगी ज़ी रहे है हम , जी रहे है जिंदगी या मर रहे है हम , कुछ ही दिन की वस्ल की ये रात है , क्यों इतना तुमसे ताल्लुकात रख रहे है हम । ये सब्र जानाँ और बांध कर रखो , एक मुफ्लिसी के दौर से गुज़र रहे है हम । जिन बादलों ने हमको ढक के रख लिया , उन बादलों के ऊपर खिल रहे है हम । महीने की कोई तारीख़ तय करो , रोज़ मिल रोज़ बिछड़ रहे है हम ।

अख़बार सच छपने को मज़बूर ना था

बिखरे कांच पर उनका कुसूर ना था , उन बोतलों में लाशों का सुरूर ना था , वो दौर आया ही नहीं कभी , जब कोई कातिल हुज़ूर ना था ।। इज्ज़त की चादर कुछ दिन और पड़ी रहती , अख़बार सच छपने को मज़बूर ना था ।। तुम तब एक कुर्सी पर गुमान करते हो , जब लाशों को अपने कफ़न पर गुरूर ना था ।। ख़्वाब उनको भी हम दिखा ना पाए , जिनके हक़ में चश्मे नूर ना था ।।

हद में रहकर इश्क़ कर रहे

बेवफ़ाओं से वफ़ा की बात नहीं चाहिए , खुदगर्ज की काएनात नहीं चाहिए , सहन करना अगर नामर्द की निशानी है , जाओ हमें मर्द की ज़ात नहीं चाहिए ।। रोटियां ख़ून में सान कर खा रहे , लूट के धन का ज़कात नहीं चाहिए ।। तुम्हारे ख्वाब की दुनिया में हम हैं तो ठीक , वर्ना तुम्हारे प्यार का खैरात नहीं चाहिए ।। तुम्हीं वस्ल की कोई तारीख़ तय करो , फ़ोन पर दिल के जज़्बात नहीं चाहिए ।। आज भी इतना शर्मा रही हो तुम , उतार आओ हमें ये ज़ेवरात नहीं चाहिए ।। हद में रहकर इश्क़ कर रहे , प्यार में "गुमनाम" औकात नहीं चाहिए ।।

चुनाव आयोग

व्यंग - निजीकरण की ओर सरकार का रुख कुछ इस कदर है की जिस प्रक्रिया से सरकार का गठन हुआ वही निजीकरण का शिकार हो गई है । पार्टी बयानों की ओर रुख किया जाए तो निष्कर्ष यही है की जब सारे विद्यालयों में शेयरिंग इस केयरिंग जैसी बातें सिखाई जाती हो तो किसी बीजेपी एमएलए की गाड़ी से वोटिंग मशीन का होना उसी शेयरिंग इज केयरिंग का एक हिस्सा है । संघफोर्ड से पढ़े अर्थशास्त्री सरकार को यह समझाने की कश्मकश में है की जिस संस्थान से मुनाफा नहीं हो रहा उसके हिस्से को बेच देना चाहिए और अंततः वो समझा भी ले गए और सरकार ने उस ओर रुख भी किया। पहले पीएसयू की बारी थी अब चुनाव आयोग की । चुनाव आयोग को भी निजी हाथों में दे देना चाहिए क्योंकि सरकार के बजट से एक बड़ी राशि चुनाव आयोग को दी जाती है और उससे सरकार के ऊपर अतिरिक्त भार बढ़ता है । मंत्रिमंडल की बैठक ने यह तय किया की चुनाव निजी कंपनियां करवाए जिससे नई तकनीक का इस्तेमाल होगा और चुनाव निष्पक्ष होंगे।  निजी कंपनियां लाभ की दृष्टि से काम करेंगी और उनके हो रहे लाभ से सरकार को कर मिलेगा । ईधर जो रुपए सरकार चुनाव आयोग को देती है वो बच जाएंगे उसे " दीन दयाल सां...

जैसे शोहरतें मिली वैसे मुज़्महिल हुए

खुद के कत्ल के इल्ज़ाम में हम शामिल हुए , जज पैसा और वो सब हम-दिल हुए , जैसे जिसका काम था उस काम के काबिल रहे , उधर तुम हुई बेवफ़ा इधर हम ज़ाहिल हुए । इन नौकरियों ने बड़ा ज़ुर्म ढहा दिया , ये मुस्तक़िल हुई और हम मुंफ़सिल हुए ।। * मुस्तक़िल - स्थाई ,  मुंफ़सिल - जुदा/अलग खुमार-ए-जहान के रंग में तुम भी रंग गए , जैसे शोहरतें मिली वैसे मुज़्महिल हुए ।। * मुज़्महिल - थका हुआ या खाली ( exhausted )   तेरे शहर में इंसाफ कैसा चल रहा 'गुमनाम' ? ज़ुर्रत देखने की तुमने की और हम क़ातिल हुए ।।