हद में रहकर इश्क़ कर रहे

बेवफ़ाओं से वफ़ा की बात नहीं चाहिए ,
खुदगर्ज की काएनात नहीं चाहिए ,

सहन करना अगर नामर्द की निशानी है ,
जाओ हमें मर्द की ज़ात नहीं चाहिए ।।

रोटियां ख़ून में सान कर खा रहे ,
लूट के धन का ज़कात नहीं चाहिए ।।

तुम्हारे ख्वाब की दुनिया में हम हैं तो ठीक ,
वर्ना तुम्हारे प्यार का खैरात नहीं चाहिए ।।

तुम्हीं वस्ल की कोई तारीख़ तय करो ,
फ़ोन पर दिल के जज़्बात नहीं चाहिए ।।

आज भी इतना शर्मा रही हो तुम ,
उतार आओ हमें ये ज़ेवरात नहीं चाहिए ।।

हद में रहकर इश्क़ कर रहे ,
प्यार में "गुमनाम" औकात नहीं चाहिए ।।

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