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लोगों खातिर बैसाखियां बनाते हुए ।।

लगेगा दिल खुद्दारियां दिखाते हुए , ख़ुद के घर जले बस्तियां जलाते हुए , खुद के पैर हम भूल बैठे हैं , लोगों खातिर बैसाखियां बनाते हुए । जिंदगी भर राह में कांटे बिछाए थे , क्यों रो रहे फ़िर अर्थियां उठाते हुए ? दिल के सारे राज़ वो खोल बैठे है , चेहरे से बेताबियां छुपाते हुए । डूबा दोगे निबाह साथ तुम " गुमनाम " , लोगों से अपनी नेकियां गिनात हुए ।।

घाव कुछ जियादा है क्या

इक अरसे बाद मिल रहे कोई इरादा है क्या ?  आंखें नम है घाव कुछ ज़ियादा है क्या ? कहां से ये नज़रे झुकाना सीख गई तुम , ज़िन्दगी में दूसरा शहजादा है क्या ? दरीचा खोल कर हाथ क्यों हिला रही , विदा करने का ये कायदा है क्या ? शतरंज की बिसात पर राजा क्यों नहीं , राजा की औकात का पियादा है क्या ? दिल , जगह और वक्त सब खाली है " गुमनाम " , इस खालीपन का कोई इस्तिफादा है क्या ??

पूरा जग उमड़ा था तेरी तमाशाई में

झुंझलाते क्यों हो बालू की चिकनाई में , उतर कर देख लो फिर थोड़ी गहराई में , मुझमें तेरे सिवा और कुछ बाकी कहां , तोहमतें भी चाहिए रुस्वाई में ।। तेरे तोहफ़ो को भी देखने के मोहताज नहीं हम , कई अब्द हुए अपनी बज़्म - आराई में ।। बिस्तर की सिलवटों को देख लग रहा, रात गुज़री है वाकई बड़ी तन्हाई में ।। उस भीड़ में हम दिखते भी कहां ,  पूरा जग उमड़ा था तेरी तमाशाई में ।। गर तुम जाना ही चाहती हो फिर चली जाओ , कुछ नहीं रखा बात की सच्चाई में ।।
कुछ अच्छा नहीं लग रहा तेरे बिना , तेरे सिवा कुछ अच्छा भी तो नहीं । कौन रौशन करे अंधेरी दुनिया मेरी , तेरे सिवा कुछ उजला भी तो नहीं । अश्क बह रहे हैं उनको बहने दो , इन चश्म में ख़्वाब तिरा भी तो नहीं । लौट कर आना चाहती हो मत आओ , मेरे घर आने का कोई रस्ता भी तो नहीं । आंखें रात भर रोती रही गुमनाम , इन आंखों में कुछ बचा भी तो नहीं ।।

ज़नाज़ा खानदानी चाहिए

मेरी जां कुछ वफ़ाई तुम्हें भी निभानी चाहिए , मेरे सिवा और भी क्या जिंदगानी चाहिए , इन निगाह से निकल कर आओ इनके सामने , आंखें दरिया बन गई और कितना पानी चाहिए । एक बोसा ही बहुत था तेरे उन रुखसार पर , और इश्क़ में तुम्हें क्या निशानी चाहिए । तुम चली हो गई दुनिया सरी बंजर हुई , फ़िर भी कहती हो जमीं पर गुल-फिशानी चाहिए । पस-अज़-मुर्दन आकर तुर्बत पे मेरी रोना नहीं , कह रहा 'गुमानम' ज़नाज़ा खानदानी चाहिए ।। गुल-फिशानी - sprinkling flower पस-अज़-मुर्दन - after death तुर्बत - कब्र 

रावण ने रावण को जलाया क्यों है

हर तरफ़ धुंध ही धुंध छाया क्यों है ? लोगों ने बत्तियों को बुझाया क्यों है ? आज भीड़ ने खुद को इक शक्ल में रखा है , हर शख़्स यहां पर ख़ुदा-या क्यों है? बुराईयों को पुतले में पेश कर रहे है वो , ऐब है तो फ़िर इतना सजाया क्यों है ? आंखों पर बंधी पट्टी हटा कर देखो , रावण ने रावण को जलाया क्यों है ? जब भरोसा है कि वो निर्णय लेगा एक दिन , फ़िर आज हमने ईश्वर को आज़माया क्यों है ? तुम अपनी नज़रें क्यों झुका रहे ' गुमनाम ' , जब जानते नहीं उन्होंने ठहाका लगाया क्यों है ?

कब तक जिंदा रखेगी ये बेहोशी मुझको

नज़रों से कितना घायल करेगी वो नक़ाबपोशी मुझको , मंज़िल भटका देते है ये बला-नोशी मुझको , उन आंखों ने कुछ तो जलवा बिखेरा है , ज़िंदा रखे है उनकी मदहोशी मुझको । भिखारी के शक्ल में लुटेरे आ गए है फ़िर , और कितना लुटाएगी ये फ़रामोशी मुझको ।। बेबाकी से कभी तअल्लुक रहा नहीं मेरा , मार डालेगी एक दिन ये ख़ामोशी मुझको । ज़मीर मारकर सांसे तो बचा लेंगे मगर , कब तक जिंदा रखेगी ये बेहोशी मुझको ।