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Showing posts from May, 2020

हक़ीक़त थे जो सारे अब फ़साने हो गए ।

कभी तेरे थे अब किसी और के ठिकाने हो गए , कभी रहे प्याले आज मयखाने हो गए , मेरा तकना और तेरा मुस्कुरा जाना , हक़ीक़त थे जो सारे अब फ़साने हो गए । तेरे दिल पर राज करना गर सब झूठा था , क्या हो गया कि हम बेगाने हो गए । उस रात मुलाकात का सच बस इतना था , नज़र मिली और हम तेरे दीवाने हो गए ।  कितनी नज़रों से बचा कर रखा तुमको , जिनसे बचाया उनके हम निशाने हो गए । ख्वाबों में ही तुमसे मिलना हो पाता था , नींद को भी आए कई ज़माने हो गए ।

कैसा दिन है जो ढलने का नाम ना ले रहा ।।

कैसा दिन है जो ढलने का नाम ना ले रहा , मजदूर खाली बैठे है मगर कोई काम ना ले रहा । बेबसी देख मलहम लगाने सब आ पहुंचे , कई लूट रहे मगर है कोई जो दाम ना ले रहा । जुबां सूखी है और वो लबों पर माइक लगाए रखे है , सब पानी चाहते है कोई भी कलाम ना ले रहा । सरकार नहीं है , वो मेहनत कर खाता है , वो इक मजदूर है साहब किसी से हराम ना ले रहा । मदिरा हो या रिश्वत सब बेखौफ ले रहे , कोई दो निवाला भी सरेआम ना ले रहा ।  कितनों ने दूसरों के टुकडों पर गुज़ार दी ज़िन्दगी अपनी , इक मजदूर है जो अपने हिस्से का तआ'म ना ले रहा । क्या हारा हुआ ही समझे उसको ?  जो जीत कर भी अपना इनाम ना ले रहा । छालों साथ नंगे पैरों से रस्ते नाप डाले , थके है , टूटे है मगर कोई भी कयाम ना ले रहा ।