क्या सत्ताधारी का अर्थ अब कानून का पालन न करने वाला हो गया है ?
एक दिन की छुट्टी जिसमे प्रदेश की पूरी जनता का रुख चुनाव
पे होता है | सुबह 7 बजे से लेकर शाम 5 बजे तक किन्ही केन्द्रों में मतदाताओं की
भीड़ बेशुमार होती है तो किसी केन्द्रों में सन्नाटा पसरा रहता है | जिस लखनऊ में
इतने ऊँचे तबके के लोग रहते है , उसी जगह ३९% मतदान हो रहा है | वे चाहते क्या है
? लखनऊ विकास कर गया है तो और आगे बढ़ने की क्यों नहीं सोचते और मांग क्यों
प्रदर्शित नहीं करते क्योंकि उन्हें पता है जो भी सत्ता आयगी वो उनकी मांगो को दबा
देगी | अगर यही हाल रहा तो क्रांति शब्द को शब्दकोष से हटा देना चाहिए और ऐसे ही चलता
रहा तो जनता के सेवक उन्ही पे तानाशाह बनकर उभरेगा और होता भी अक्सर यही है कि
सत्ताधारी निरंकुश हो जाते है और ऐसे में जनता सभी नेतृत्वकर्ता को गलत समझ बैठती
है | रुतबा तो रहता ही है साहब मंत्री पद की कुर्सी पर बैठने का, सीना चौड़ा , सर
कभी झुकता नहीं , गाडियों का काफिला कभी रुकता नहीं कई चीजे जो वी.आई.पी कल्चर अभी
भी बनी हुई है मात्र लाल बत्ती हटाने से वी.आई.पी कल्चर ख़त्म हो जाता तो देश में
सुधार की किरण जगमगा उठती और तस्वीर में प्रतिदिन बदलाव आने लगता | यहाँ पर मुद्दे
खुद ही तय किये जाते है की हर पंचवर्षीय में हर प्रदेश के हर जिले के हर तहसील के
हर गाँव तक पहुचाई जाएगी कोई भी घर बिजली से वंचित नहीं रहेगा | जांचकर्ता कभी उस
गाँव तक पहुंचते ही नहीं जहाँ पर बिजली पहुंची ही नहीं अगर पहुंची है तो लोगो तक
क्या पहुँच पाई है या केवल कागजों में ही दस्तख़त हो रहे है | चलिए उदाहरण गाँव
सतहरा का ले लीजिये जो जिला संतकबीर नगर में थाना महुली के पास स्थित है वहाँ
बिजली तो पहुंची मगर बिजली का कनेक्शन कितनो के पास है मात्र 7-8 घरों में सब
लाइनमैन से जुगाड़ फिक्स रहता है तो न कोई अफसर पहुंचता है न कोई जान्चकर्मी | वहां
के लोग ३७ वर्षों से कटिया फंसाए हो गया परन्तु अब तक उन घरों किसी अफसर की दस्तक
नहीं हुई | यह भी नहीं है की उन घरों में कोई कमाने वाला न हो और बिजली का बिल न
चूका पाए | यही हाल रहा तो देश भगवान पर ही निर्भर रहे तो अच्छा होगा | क्यों के
चुनाव में इतने रूपए खर्च किये जाते है और जब अपराधों की दुनिया में लोगों को
बदलना ही नहीं तो पड़े रहने दो | यह लोग बखूबी समझते है की सरकार हमारे लिए है तो
हम कुछ करे कोई फर्क नहीं पड़ता है | हर सरकार पांच वर्षों में बिजली माफ़ करती है
परन्तु कनेक्शन क्यों सब नहीं लेते है सवाल यही है ? इन अपराधों में सरकार क्यों
भागीदार बनती है | क्या सरकार खुद अपराधी
होती गई है ? कोई भी आई.पी.एस अफसर का मर्डर हो जाता है उसकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट
भी बदल दी जाती है | दिन रात अपराधों का सिलसिला जारी रहता है परन्तु सरकार का
पुलिस पर नियंत्रण ही नहीं रहता क्यूंकि उनके भी मंत्रियों के शागिर्दों तो बिना
डी.एल के गाडी चलाने का शौक रहता है चेकिंग लगती है तो कोई बड़ा नेता बीच में टांग
अदने लगता है | क्यों वे क़ानून का पालन नहीं करते ? क्यूंकि वो क़ानून को जेब में
लेकर घूमते है | कोई २ ली. का ठंडा दे कर पुलिस से छुटकारा पा जाता है एक नेता का
करीबी चलान बिना कहे कटवा लेता है परन्तु जब उसने घर में जाके वही बात नेता को
बताई तो वे पुलिस को उनकी औकात बताने चले आते है | कानून अगर अँधा है तो उसका डंडा
उनपर भी पड़ना चाहिए जो ये सोचते है की मै सत्ता में हूँ तो मेरा ही क़ानून सब पे
चलेगा | क्या सब के मन में ये धारणा बैठ चुकी है की सत्ताधारी का अर्थ ही है की
क़ानून पे शासन ?
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