एक खूबसूरत ज़ालिम रिश्तों में पड़ गया

बिना बात के ही वो मुझसे झगड़ गया ,
बिछड़ना चाहता था वो , सो बिछड़ गया ,

हर आंच बुझ गई हैं ताल्लुकातों की ,
एक खूबसूरत ज़ालिम रिश्तों में पड़ गया ।।

रिश्तों सी फिसलन इन हाथ में न थी ,
गिरते हाथ थाम लेता मगर वो बढ़ गया ।।

सुनाने आए थे किस्से वफ़ा के तेरे ,
वो दरख़्त हवा चलने से पहले उखड़ गया ।।

गमज़दा होने की क्या अदाकारी की ,
ये दुःख ‘गुमनाम’ गले ही पड़ गया ।।


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